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श्लोक 2.93.25  |
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु नेतो गन्तव्यमग्रत:।
अहमेव गमिष्यामि सुमन्त्रो धृतिरेव च॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| 'तुम सब लोग सावधान रहो और यहीं रहो! यहाँ से आगे मत जाओ। अब मैं अकेला ही वहाँ जाऊँगा। सुमन्तराम और धृति भी मेरे साथ रहेंगे।'॥25॥ |
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| 'All of you be cautious and stay here! Do not go further from here. Now I alone will go there. Sumantram and Dhriti will also be with me.'॥ 25॥ |
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