श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 93: सेना सहित भरत की चित्रकूट-यात्रा का वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.93.18 
अतिमात्रमयं देशो मनोज्ञ: प्रतिभाति मे।
तापसानां निवासोऽयं व्यक्तं स्वर्गपथोऽनघ॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'निष्पाप शत्रुघ्न! यह देश मुझे अत्यंत सुन्दर प्रतीत होता है। यह तपस्वियों का निवास सचमुच स्वर्ग का मार्ग है।॥18॥
 
'Innocent Shatrughna! This country appears very beautiful to me. This abode of ascetics is truly the path to heaven.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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