श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 93: सेना सहित भरत की चित्रकूट-यात्रा का वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.93.10 
मुञ्चन्ति कुसुमान्येते नगा: पर्वतसानुषु।
नीला इवातपापाये तोयं तोयधरा घना:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
ये वृक्ष पर्वत शिखरों पर उसी प्रकार पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं, जैसे वर्षा ऋतु में नीले बादल उन पर जल बरसाते हैं।॥10॥
 
‘These trees are showering flowers on the mountain peaks in the same way as blue rain clouds shower water on them during the rainy season.’॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)