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श्लोक 2.92.30  |
न दोषेणावगन्तव्या कैकेयी भरत त्वया।
रामप्रव्राजनं ह्येतत् सुखोदर्कं भविष्यति॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| 'भरत! कैकेयी को नकारात्मक दृष्टि से मत देखो। श्री राम का यह वनवास भविष्य में बहुत सुखद होगा।' |
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| ‘Bharat! Do not look at Kaikeyi with a negative attitude. This exile of Shri Ram will be very pleasant in the future. |
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