श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 92: भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम जाने का मार्ग जानना, वहाँ से चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रस्थान करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.92.28 
इत्युक्त्वा नरशार्दूलो बाष्पगद्‍गदया गिरा।
विनि:श्वस्य स ताम्राक्ष: क्रुद्धो नाग इव श्वसन्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
अश्रुपूर्ण शब्दों में ऐसा कहकर लाल नेत्रों वाले सिंहपुरुष भरत क्रोध से फुंफकारने लगे और सर्प के समान लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे।
 
Having said this with tearful words, Bharata, the lion-man with red eyes, began to hiss in anger and take long breaths like a serpent.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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