vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 92: भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम जाने का मार्ग जानना, वहाँ से चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रस्थान करना
»
श्लोक 28
श्लोक
2.92.28
इत्युक्त्वा नरशार्दूलो बाष्पगद्गदया गिरा।
विनि:श्वस्य स ताम्राक्ष: क्रुद्धो नाग इव श्वसन्॥ २८॥
अनुवाद
अश्रुपूर्ण शब्दों में ऐसा कहकर लाल नेत्रों वाले सिंहपुरुष भरत क्रोध से फुंफकारने लगे और सर्प के समान लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे।
Having said this with tearful words, Bharata, the lion-man with red eyes, began to hiss in anger and take long breaths like a serpent.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas