| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 92: भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम जाने का मार्ग जानना, वहाँ से चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रस्थान करना » श्लोक 25-27 |
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| | | | श्लोक 2.92.25-27  | यस्या: कृते नरव्याघ्रौ जीवनाशमितो गतौ।
राजा पुत्रविहीनश्च स्वर्गं दशरथो गत:॥ २५॥
क्रोधनामकृतप्रज्ञां दृप्तां सुभगमानिनीम्।
ऐश्वर्यकामां कैकेयीमनार्यामार्यरूपिणीम्॥ २६॥
ममैतां मातरं विद्धि नृशंसां पापनिश्चयाम्।
यतोमूलं हि पश्यामि व्यसनं महदात्मन:॥ २७॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘और जिनके कारण पुरुषों के सिंह श्री राम और लक्ष्मण प्राण संकट में पड़कर वनवास को चले गए हैं और राजा दशरथ पुत्र-वियोग का दुःख भोगकर स्वर्गलोक को चले गए हैं, जो स्वभाव से क्रोधी, अल्पज्ञ, अभिमानी, अपने को परम सुन्दरी और सौभाग्यवती स्त्री समझती हैं और राज्य की लालसा रखती हैं, जो देखने में आर्य हैं, परन्तु वास्तव में अनार्य हैं, ऐसी कैकेयी को ही मेरी माता समझो। वह अत्यन्त क्रूर और पापमय विचारों वाली हैं। मैं अपने ऊपर जो महान् संकट आते देख रहा हूँ, उसका यही मुख्य कारण है।’॥25-27॥ | | | | ‘And because of whom the lion of men Shri Ram and Lakshman have gone into exile in a life-threatening condition and King Dasharath has gone to heaven after suffering the pain of separation from his son, who is short-tempered by nature, has an uneducated mind, is proud, considers herself to be the most beautiful and fortunate woman and covets the kingdom, who is an Aryan in appearance but is actually an un-Aryan, consider this Kaikeyi to be my mother. She is very cruel and has sinful thoughts. This is the main reason of the great crisis that I see coming upon me.’॥ 25-27॥ | | ✨ ai-generated | | |
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