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श्लोक 2.91.83  |
तथैव मत्ता मदिरोत्कटा नरा-
स्तथैव दिव्यागुरुचन्दनोक्षिता:।
तथैव दिव्या विविधा: स्रगुत्तमा:
पृथग्विकीर्णा मनुजै: प्रमर्दिता:॥ ८३॥ |
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| अनुवाद |
| प्रातःकाल होने पर भी लोग वैसे ही मतवाले और उन्मत्त दिखाई दे रहे थे। उनके शरीर के अंगों पर दिव्य अगुरुयुक्त चंदन का लेप स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मनुष्यों के उपभोग के लिए लाई गई नाना प्रकार की दिव्य उत्तम पुष्पमालाएँ भी उसी अवस्था में अलग-अलग बिखरी पड़ी थीं। 83॥ |
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| Even after morning came, people looked the same drunk and crazy. The paste of divine Aguruyukt sandalwood was clearly visible on his body parts. Various types of divine exquisite flower garlands which were brought for human consumption were also scattered separately in the same condition. 83॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकनवतितम: सर्ग:॥ ९१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९१॥ |
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