| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 91: भरद्वाज मुनि के द्वारा सेना सहित भरत का दिव्य सत्कार » श्लोक 77 |
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| | | | श्लोक 2.91.77  | आञ्जनी: कङ्कतान् कूर्चांश्छत्राणि च धनूंषि च।
मर्मत्राणानि चित्राणि शयनान्यासनानि च॥ ७७॥ | | | | | | अनुवाद | | वहाँ काजल, कंघी, ब्रश (ठाकरी या ब्रुश), छाता, धनुष, गुप्त अंगों की रक्षा के लिए कवच आदि से युक्त कजरौटा तथा विचित्र शय्याएँ और आसन भी दिखाई दे रहे थे॥77॥ | | | | Kajrauta with mascara, comb, brush (thakari or brush), umbrella, bow, armor to protect the private parts, etc. and strange beds and seats were also visible there. 77॥ | | ✨ ai-generated | | |
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