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श्लोक 2.91.70  |
वाप्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टमांसचयैर्वृता:।
प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूरकौक्कुटै:॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| भरत की सेना में आये निषाद आदि निम्न जाति के लोगों को संतुष्ट करने के लिए वहाँ शहद से भरे हुए कुएँ बनवाये गये थे और उनके किनारों पर गर्म पिठार (तालाब) में पकाकर हिरण, मोर और मुर्गे के स्वच्छ मांस के ढेर रखे गये थे। |
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| To satisfy the lower caste people like the Nishads who had come in Bharat's army, wells full of honey had appeared there and on their banks heaps of clean meat of deer, peacock and fowl were kept cooked in a heated pithar (tank). |
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