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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 91: भरद्वाज मुनि के द्वारा सेना सहित भरत का दिव्य सत्कार  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.91.65 
कुञ्जराश्च खरोष्ट्राश्च गोऽश्वाश्च मृगपक्षिण:।
बभूवु: सुभृतास्तत्र नातो ह्यन्यमकल्पयत्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट, बैल, मृग और पक्षी भी वहाँ पूर्णतया तृप्त रहते थे, इसलिए किसी को अन्य किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती थी।
 
Elephants, horses, donkeys, camels, bulls, deer and birds too were completely satisfied there; therefore no one desired anything else. 65.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)