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श्लोक 2.91.61  |
सम्प्रहृष्टा विनेदुस्ते नरास्तत्र सहस्रश:।
भरतस्यानुयातार: स्वर्गोऽयमिति चाब्रुवन्॥ ६१॥ |
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| अनुवाद |
| भरत के साथ आये हजारों लोग उस स्थान की शोभा देखकर आनन्द से भर जाते थे और ऊंचे स्वर से कहते थे - यह स्थान स्वर्ग है। |
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| Thousands of people who had come with Bharat were filled with joy on seeing the splendor of the place and used to say loudly - This place is heaven. 61. |
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