श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 91: भरद्वाज मुनि के द्वारा सेना सहित भरत का दिव्य सत्कार  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.91.23 
मनसा ध्यायतस्तस्य प्राङ्मुखस्य कृताञ्जले:।
आजग्मुस्तानि सर्वाणि दैवतानि पृथक् पृथक्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार स्वयं का आह्वान करके ऋषि पूर्वाभिमुख होकर हाथ जोड़कर मन में ध्यान करने लगे। स्मरण करते ही एक-एक करके सभी देवता वहाँ आ पहुँचे॥23॥
 
Having invoked Himself in this manner, the sage faced east and with folded hands began to meditate in his mind. As soon as he remembered them, all the gods arrived there one by one.॥23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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