श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 90: भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत तथा मुनि का अपने आश्रम पर ही ठहरने का आदेश देना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  2.90.1-2 
भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभ:।
जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभि:॥ १॥
पद‍्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छद:।
वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर धर्म को जानने वाले श्रेष्ठ पुरुष भरत ने अपने सब साथियों को आश्रम से एक मील दूर ही ठहरा दिया और अपने शस्त्र तथा राजसी वस्त्र भी उतारकर वहीं रख दिए। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके तथा पुरोहित को आगे करके वे अपने मंत्रियों के साथ पैदल ही वहाँ चले गए॥1-2॥
 
On reaching the Bharadwaj Ashram, Bharata, the best of men, having knowledge of Dharma, had made all his companions stay a mile away from the Ashram and had also taken off his arms and royal clothes and kept them there. Wearing only two silken clothes and with the priest in front, he went there on foot with his ministers.॥1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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