| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश » श्लोक 64 |
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| | | | श्लोक 2.9.64  | अहं हि नैवास्तरणानि न स्रजो
न चन्दनं नाञ्जनपानभोजनम्।
न किंचिदिच्छामि न चेह जीवनं
न चेदितो गच्छति राघवो वनम्॥ ६४॥ | | | | | | अनुवाद | | यदि राम यहाँ से वन को न जाएँ, तो मुझे न तो नाना प्रकार की शय्याएँ चाहिए, न पुष्पमालाएँ, न चन्दन, न नेत्रों का लेप, न पान, न अन्न, न अन्य कोई वस्तु चाहिए। ऐसी स्थिति में तो मैं यहाँ यह जीवन भी नहीं रखना चाहूँगा॥ 64॥ | | | | 'If Rama does not go to the forest from here, then I will neither want different kinds of beds, nor garlands of flowers, nor sandalwood, nor eye ointment, nor betel, nor food, nor any other thing. In that condition, I will not even want to keep this life here.'॥ 64॥ | | ✨ ai-generated | | |
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