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श्लोक 2.9.52  |
तवापि कुब्जा: कुब्जाया: सर्वाभरणभूषिता:।
पादौ परिचरिष्यन्ति यथैव त्वं सदा मम॥ ५२॥ |
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| अनुवाद |
| 'जिस प्रकार आप सदैव मेरे चरणों की सेवा करते हैं, उसी प्रकार अनेक कुबड़ी स्त्रियाँ भी समस्त आभूषणों से सुसज्जित होकर सदैव आपके चरणों की सेवा करेंगी।' |
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| 'Just as you always serve my feet, in the same way many hunchbacked women adorned with all the ornaments will always serve the feet of you too.' |
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