श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.9.51 
चन्द्रमाह्वयमानेन मुखेनाप्रतिमानना।
गमिष्यसि गतिं मुख्यां गर्वयन्ती द्विषज्जने॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
'चन्द्रमा को टक्कर देने वाले अपने मनोहर मुख से तुम इतनी सुन्दर हो जाओगी कि कोई भी तुम्हारे मुख की बराबरी नहीं कर सकेगा। तथा अपने सौभाग्य पर गर्व करते हुए तुम शत्रुओं में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करोगी। ॥ 51॥
 
'With your charming face that competes with the moon, you will look so beautiful that no one will match your face. And expressing pride in your good fortune, you will attain the best position among your enemies. ॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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