श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  2.9.44-45h 
जङ्घे भृशमुपन्यस्ते पादौ च व्यायतावुभौ।
त्वमायताभ्यां सक्थिभ्यां मन्थरे क्षौमवासिनी॥ ४४॥
अग्रतो मम गच्छन्ती राजसेऽतीव शोभने।
 
 
अनुवाद
'मंथरा! तुम्हारी पिंडलियाँ एक-दूसरे से सटी हुई हैं और दोनों पैर बड़े हैं। तुम्हारी जांघें विशाल हैं। सुन्दरी! जब तुम रेशमी साड़ी पहनकर मेरे सामने चलती हो, तो बहुत सुन्दर लगती हो। 44 1/2।'
 
‘Manthra! Your calves are very close to each other and both feet are big. You are adorned with huge thighs. Beautiful! When you walk in front of me wearing a silk saree, you look very beautiful. 44 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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