श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.9.43 
विमलेन्दुसमं वक्त्रमहो राजसि मन्थरे।
जघनं तव निर्मृष्टं रशनादामभूषितम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
'मंथरा! तुम्हारा मुख निर्मल चन्द्रमा के समान सुन्दर है। तुम्हारी कमर का अग्रभाग करधनी की जंजीरों से सुशोभित है, तथा उसमें कोई दोष नहीं है।
 
‘Manthra! Your face is as beautiful as the pure moon. The front of your waist, adorned with the chains of your girdle, is very clean and free from any blemishes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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