श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 89: भरत का सेना सहित गङ्गापार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.89.3 
जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन्।
इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुघ्नो विप्रचोदित:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उनसे इस प्रकार प्रेरित होकर शत्रुघ्न बोले - 'भैया! मैं भी तुम्हारी ही भाँति श्री रामजी का स्मरण करते हुए जागता हूँ, सोता नहीं हूँ।'॥3॥
 
Being inspired by him in this manner, Shatrughna said - 'Brother! Just like you, I too am awake thinking of the noble Sri Ram; I do not sleep.'॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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