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श्लोक 2.89.1  |
व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले स राघव:।
काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| श्रृंगवेरपुर में ही गंगाजी के तट पर रात्रि व्यतीत करके प्रातःकाल उठकर रघुकुलनन्दन भरत शत्रुघ्न से इस प्रकार बोले- 1॥ |
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| After spending the night on the banks of Ganga in Shringaverpur itself, Raghukulnandan Bharat woke up in the morning and spoke to Shatrughan thus - 1॥ |
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