श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 88: श्रीराम की कुश-शय्या देखकर भरत का स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.88.26 
अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा।
फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
‘आज से मैं भूमि पर या तिनकों पर सोऊँगा, केवल कंद-मूल और फल खाऊँगा तथा सदैव छाल के वस्त्र और जटाएँ धारण करूँगा॥ 26॥
 
‘From today onwards I will sleep on the ground or on straws, eat only roots and fruits and will always wear bark clothes and matted hair.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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