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श्लोक 2.88.26  |
अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा।
फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन्॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| ‘आज से मैं भूमि पर या तिनकों पर सोऊँगा, केवल कंद-मूल और फल खाऊँगा तथा सदैव छाल के वस्त्र और जटाएँ धारण करूँगा॥ 26॥ |
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| ‘From today onwards I will sleep on the ground or on straws, eat only roots and fruits and will always wear bark clothes and matted hair.॥ 26॥ |
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