vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 87: भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना
»
श्लोक 4
श्लोक
2.87.4
भरतं मूर्च्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुह:।
बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुम:॥ ४॥
अनुवाद
भरत को अचेत देखकर गुह का मुख पीला पड़ गया। वह भूकंप में हिले हुए वृक्ष की भाँति व्याकुल हो गया।
Seeing Bharata unconscious, Guha's face turned pale. He became distressed like a tree shaken during an earthquake.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas