vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 87: भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना
»
श्लोक 20
श्लोक
2.87.20
सौमित्रिस्तु तत: पश्चादकरोत् स्वास्तरं शुभम्।
स्वयमानीय बर्हींषि क्षिप्रं राघवकारणात्॥ २०॥
अनुवाद
'तत्पश्चात लक्ष्मणजी ने स्वयं कुश लाकर श्री रामचन्द्रजी के लिए शीघ्रतापूर्वक सुन्दर पलंग बिछा दिया॥20॥
'After that, Lakshman himself brought Kush and quickly spread a beautiful bed for Shri Ramchandraji. 20॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas