| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 87: भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना » श्लोक 2-3 |
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| | | | श्लोक 2.87.2-3  | सुकुमारो महासत्त्व: सिंहस्कन्धो महाभुज:।
पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुण: प्रियदर्शन:॥ २॥
प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मना:।
ससाद सहसा तोत्रैर्हृदि विद्ध इव द्विप:॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | भरत बड़े बलवान और सुकुमार थे। उनके कंधे सिंह के समान, भुजाएँ विशाल और नेत्र खिले हुए कमलों के समान सुन्दर थे। वे युवा थे और अत्यंत आकर्षक दिखते थे। गुह की बात सुनकर वे किसी प्रकार कुछ देर तक तो शांत रहे, परन्तु फिर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुश से बिंधे हुए हाथी के समान अत्यन्त व्याकुल हो गए और सहसा दुर्बल होकर मूर्छित हो गए॥2-3॥ | | | | Bharata was very strong and delicate. His shoulders were like those of a lion, his arms were large and his eyes were beautiful like blooming lotuses. He was young and looked very charming. After listening to Guha, he somehow managed to remain calm for a while, but then he felt very sad. He was very distressed like an elephant pierced by a goad and suddenly became weak and unconscious.॥2-3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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