श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 87: भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.87.12 
स मुहूर्तं समाश्वस्य रुदन्नेव महायशा:।
कौसल्यां परिसान्त्व्येदं गुहं वचनमब्रवीत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जब दो ही घण्टे में महाबली भरत का मन स्वस्थ हो गया, तब उन्होंने रोते हुए कौशल्या को सान्त्वना दी (और कहा- ‘माता! चिन्ता न करो, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी।’) फिर उन्होंने निषादराज गुह से इस प्रकार पूछा- ॥12॥
 
When in just two hours the mind of the illustrious Bharata became healthy, he consoled Kausalya while crying (and said—'Mother! Do not worry, I have not heard anything unpleasant'). Then he asked Nishadraj Guha in this manner—॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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