श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 86: निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.86.6 
अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद्यश:।
धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च केवलौ॥ ६॥
 
 
अनुवाद
श्री रघुनाथजी की कृपा से ही मैं इस लोक में महान यश, प्रचुर धर्मलाभ, शुद्ध धन और भोग की आशा करता हूँ। 6॥
 
'It is only from the blessings of Shri Raghunathji that I hope to attain great fame, abundant religious benefits and pure wealth and enjoyment in this world.' 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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