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श्लोक 2.85.4  |
कतरेण गमिष्यामि भरद्वाजाश्रमं यथा।
गहनोऽयं भृशं देशो गङ्गानूपो दुरत्यय:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'निषादराज! इन दोनों में से किस मार्ग से मैं भारद्वाज ऋषि के आश्रम जाऊँ? गंगा के तट पर स्थित यह क्षेत्र अत्यन्त गहन प्रतीत होता है। इसे पार करके आगे बढ़ना कठिन है।'॥4॥ |
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| 'Nishadraj! Which of these two routes should I take to go to the hermitage of sage Bharadwaj? This region on the banks of the Ganga seems very deep. It is difficult to cross it and move forward.'॥ 4॥ |
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