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श्लोक 2.85.22  |
गुहेन सार्धं भरत: समागतो
महानुभाव: सजन: समाहित:।
सुदुर्मनास्तं भरतं तदा पुन-
र्गुह: समाश्वासयदग्रजं प्रति॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| जब एकाग्रचित्त भरत अपने परिवार सहित गुह से मिले, तो वे बहुत दुःखी हुए। उन्हें अपने बड़े भाई की चिंता थी, इसलिए गुह ने उन्हें पुनः आश्वस्त किया। |
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| When the concentrated noble Bharata met Guha along with his family, he was very sad. He was worried for his elder brother, so Guha reassured him again. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशीतितम: सर्ग:॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५॥ |
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