श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 85: गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  2.85.2 
ऊर्जित: खलु ते काम: कृतो मम गुरो: सखे।
यो मे त्वमीदृशीं सेनामभ्यर्चयितुमिच्छसि॥ २॥
 
 
अनुवाद
'भैया! आप मेरे बड़े भाई श्री राम के मित्र हैं। आप मेरी इतनी बड़ी सेना का सम्मान करना चाहते हैं, आपकी यह इच्छा अत्यन्त उत्तम है। आप इसे पूर्ण समझें - आपकी भक्ति के कारण हम सब सम्मानित हुए हैं।'॥ 2॥
 
'Brother! You are a friend of my elder brother Shri Ram. You want to honour such a large army of mine, this desire of yours is very noble. You should consider it fulfilled - we have all been honoured because of your devotion.'॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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