श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 85: गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.85.12 
धन्यस्त्वं न त्वया तुल्यं पश्यामि जगतीतले।
अयत्नादागतं राज्यं यस्त्वं त्यक्तुमिहेच्छसि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘तुम धन्य हो, जो अनायास ही हाथ में आए हुए राज्य को त्याग देना चाहते हो। मैं इस संसार में तुम्हारे समान धर्मात्मा किसी को नहीं देखता।॥12॥
 
‘You are blessed, who want to give up the kingdom which has come into their hands without any effort. I do not see anyone as pious as you in this world.॥ 12॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas