श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 85: गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.85.10 
तं निवर्तयितुं यामि काकुत्स्थं वनवासिनम्।
बुद्धिरन्या न मे कार्या गुह सत्यं ब्रवीमि ते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थ कुल के रत्न श्री राम वन में रहते हैं, इसलिए मैं उन्हें वापस लाने जा रहा हूँ। गुह! मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ। तुम्हें मेरे विषय में अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए।'॥10॥
 
'Sri Ram, the jewel of the Kakutstha clan, lives in the forest, so I am going to bring him back. Guha! I am telling you the truth. You should not think otherwise about me.'॥10॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas