श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 85: गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.85.1 
एवमुक्तस्तु भरतो निषादाधिपतिं गुहम्।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञो वाक्यं हेत्वर्थसंहितम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
जब निषादराज गुह ने ऐसा कहा, तब महाज्ञानी भरतने युक्ति और उद्देश्य से परिपूर्ण वचनों में उन्हें उत्तर दिया - ॥1॥
 
When Nishadraj Guha said this, the great wise Bharatane replied to him in words full of tact and purpose – ॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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