श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 83: भरत की वनयात्रा और शृङ्गवेरपुर में रात्रिवास  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.83.25 
तस्यैवं ब्रुवतोऽमात्यास्तथेत्युक्त्वा समाहिता:।
न्यवेशयंस्तांश्छन्देन स्वेन स्वेन पृथक् पृथक्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उनके ऐसा कहने पर समस्त मन्त्रियों ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उनकी इच्छानुसार सब सैनिकों को भिन्न-भिन्न स्थानों पर तैनात कर दिया॥ 25॥
 
On his saying this, all the ministers accepted his command saying 'Tathastu' and stationed all the soldiers at different places according to his wish.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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