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ramayan 2.83.1: तत्पश्चात् भरतजी प्रातःकाल उठकर एक सुन्दर रथ पर सवार हुए और श्री रामचन्द्रजी के दर्शन की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक चल पड़े॥1॥   |   ramayan सर्ग 2.83: भरत की वनयात्रा और शृङ्गवेरपुर में रात्रिवास   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 83: भरत की वनयात्रा और शृङ्गवेरपुर में रात्रिवास  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.83.1 
तत: समुत्थित: कल्यमास्थाय स्यन्दनोत्तमम्।
प्रययौ भरत: शीघ्रं रामदर्शनकाम्यया॥ १॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भरतजी प्रातःकाल उठकर एक सुन्दर रथ पर सवार हुए और श्री रामचन्द्रजी के दर्शन की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक चल पड़े॥1॥
 
Thereafter, Bharata woke up early in the morning, mounted on a fine chariot, and set out quickly with the desire to have the darshan of Shri Ramchandraji. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)