श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  2.82.7-8 
पित्रा भ्रात्रा च ते दत्तं राज्यं निहतकण्टकम्।
तद् भुङ्क्ष्व मुदितामात्य: क्षिप्रमेवाभिषेचय॥ ७॥
उदीच्याश्च प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च केवला:।
कोटॺापरान्ता: सामुद्रा रत्नान्युपहरन्तु ते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार तुम्हारे पिता और तुम्हारे बड़े भाई दोनों ने तुम्हें यह अखण्ड राज्य प्रदान किया है। अतः तुम्हें अपने मंत्रियों को प्रसन्न रखते हुए इसका पालन करना चाहिए और शीघ्र ही अपना अभिषेक करवाना चाहिए। जिससे उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व आदि देशों के राजा तथा समुद्र में जहाजों द्वारा व्यापार करने वाले व्यापारी तुम्हें असंख्य रत्न प्रदान करें। 7-8
 
‘Thus, both your father and your elder brother have given you this uninterrupted kingdom. Therefore, you should follow it while keeping your ministers happy and get yourself anointed soon. So that the kings of the north, west, south, east and other countries and the businessmen doing business through ships in the sea may give you innumerable gems. 7-8.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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