श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.82.4 
राज्ञस्तु प्रकृती: सर्वा: स सम्प्रेक्ष्य च धर्मवित् ।
इदं पुरोहितो वाक्यं भरतं मृदु चाब्रवीत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उस समय धर्म में पारंगत पुरोहित वसिष्ठ ने राजा के सम्पूर्ण स्वभावों को उपस्थित देखकर भरत से ये मधुर वचन कहे-॥4॥
 
At that time the priest Vasishtha, who was well versed in Dharma, seeing the presence of all the natures of the king, spoke these sweet words to Bharata -॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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