श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.82.31 
स सूतपुत्रो भरतेन सम्य-
गाज्ञापित: सम्परिपूर्णकाम:।
शशास सर्वान् प्रकृतिप्रधानान्
बलस्य मुख्यांश्च सुहृज्जनं च॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
भरत की यह उत्तम आज्ञा पाकर सूतपुत्र सुमन्त्र ने अपनी मनोकामना सफल समझी और उन्होंने समस्त प्रमुख लोगों, सेनापतियों तथा प्रजाजनों के मित्रों को भरत की आज्ञा सुना दी ॥31॥
 
After receiving this good command from Bharat, Suta's son Sumantra considered his wish to be successful and he announced Bharat's order to all the prominent people, commanders and friends of the people. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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