श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.82.3 
सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तथा।
अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जैसे वर्षा ऋतु के बीत जाने पर शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात्रि अत्यन्त सुन्दर लगती है, उसी प्रकार विद्वानों के समूह से भरी हुई वह सभा अत्यन्त सुन्दर लग रही थी॥3॥
 
Just as the full moon-lit night of the autumn season looks very beautiful after the rainy season is over, similarly that assembly filled with the group of learned people looked very beautiful. ॥3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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