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श्लोक 2.82.22  |
तूर्णमुत्थाय गच्छ त्वं सुमन्त्र मम शासनात्।
यात्रामाज्ञापय क्षिप्रं बलं चैव समानय॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| ‘सुमन्त्र जी! आप शीघ्र उठकर सबको वन में जाने का मेरा आदेश सुनाएँ और शीघ्र ही सेना भी बुला लें।’॥22॥ |
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| ‘Sumantra ji! You get up quickly and go and inform everyone about my order to go to the forest and also call the army as soon as possible.’॥ 22॥ |
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