श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.82.21 
एवमुक्त्वा तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सल:।
समीपस्थमुवाचेदं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
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Saying this to the members of the congregation, the fraternal and virtuous Bharata spoke to Sumantra, the mantra expert sitting nearby, in this manner – ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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