श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.82.20 
विष्टिकर्मान्तिका: सर्वे मार्गशोधकदक्षका:।
प्रस्थापिता मया पूर्वं यात्रा च मम रोचते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'मैंने यहाँ से मार्ग साफ करने में कुशल सभी अवैतनिक और वेतनभोगी कर्मचारियों को पहले ही विदा कर दिया है। इसलिए मुझे श्री रामचंद्रजी के पास जाना ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है।'॥20॥
 
'I have already sent away all the unpaid and salaried workers skilled in cleaning the path from here. Therefore, it seems better to me to go to Shri Ramchandraji.'॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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