श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.82.18 
यदि त्वार्यं न शक्ष्यामि विनिवर्तयितुं वनात्।
वने तत्रैव वत्स्यामि यथार्यो लक्ष्मणस्तथा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
भरत ने फिर कहा- 'यदि मैं आर्य श्री राम को वन से लौटाने में समर्थ न होऊँ, तो मैं स्वयं मनुष्यों में श्रेष्ठ लक्ष्मण के समान वहाँ निवास करूँगा॥18॥
 
Bharat again said - 'If I am not able to return Arya Shri Ram from the forest, then I myself will reside there like Lakshman, the best among humans. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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