श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.82.15 
यद्धि मात्रा कृतं पापं नाहं तदपि रोचये।
इहस्थो वनदुर्गस्थं नमस्यामि कृताञ्जलि:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'मैं अपनी माता के द्वारा किए गए पापों को पसंद नहीं करता; इसलिए मैं यहाँ रहते हुए भी सुदूर वन में निवास करने वाले श्री रामजी को हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।॥15॥
 
'I do not like the sins committed by my mother; therefore, even while staying here, I bow down to Shri Rama, who resides in the remote forest, with folded hands. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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