श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.82.11 
चरितब्रह्मचर्यस्य विद्यास्नातस्य धीमत:।
धर्मे प्रयतमानस्य को राज्यं मद्विधो हरेत्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
गुरुदेव! मेरे समान कौन ऐसा है जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले, समस्त विद्याओं में निपुण और धर्म के लिए सदैव प्रयत्नशील रहने वाले बुद्धिमान श्री रामचंद्रजी के राज्य को हड़प सके?॥ 11॥
 
Gurudev! Who like me can usurp the kingdom of the wise Shri Ramchandraji who has observed celibacy, who has mastered all the knowledge and who always strives for religion?॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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