श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.82.1 
तामार्यगणसम्पूर्णां भरत: प्रग्रहां सभाम्।
ददर्श बुद्धिसम्पन्न: पूर्णचन्द्रां निशामिव॥ १॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान भरत ने उस सभा को रात्रि के समान श्रेष्ठ ग्रहों और नक्षत्रों से सुशोभित तथा पूर्ण चन्द्रमा से प्रकाशित देखा। वह महापुरुषों के समूह से परिपूर्ण थी तथा वशिष्ठ आदि महर्षियों की उपस्थिति से सुशोभित थी।॥1॥
 
The intelligent Bharata saw that gathering like a night adorned with the best planets and stars and illuminated by the full moon. It was filled with the company of great men and was adorned with the presence of great sages like Vashishtha etc. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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