श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.81.4 
तत: प्रबुद्धो भरतस्तं घोषं संनिवर्त्य च।
नाहं राजेति चोक्त्वा तं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
बाजे की ध्वनि सुनकर भरत की नींद खुल गई; वे उठे और 'मैं राजा नहीं हूँ' कहकर बाजे बजाना बंद कर दिया। तत्पश्चात उन्होंने शत्रुघ्न से कहा -
 
Bharat woke up from his sleep due to the sound of the musical instruments; he got up and saying, 'I am not the king', he stopped playing the musical instruments. After that he said to Shatrughna -
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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