श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.81.15 
ततो भरतमायान्तं शतक्रतुमिवामरा:।
प्रत्यनन्दन् प्रकृतयो यथा दशरथं तथा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जैसे देवता इन्द्र का अभिवादन करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रकृतियाँ (मंत्री, प्रजा आदि) राजा दशरथ के समान भरत का आकर अभिवादन करने लगीं।
 
After that, just as the gods greet Indra, in the same way all the natures (ministers, subjects etc.) came and greeted Bharata like King Dasharatha.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas