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ramayan 2.81.10-11: वह सभाभवन अधिकांशतः सोने का बना हुआ था। उसमें स्वर्ण के स्तंभ थे। वह सुन्दर सभा देवताओं की पुण्यसभा के समान शोभायमान थी। सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता पुण्यात्मा वसिष्ठ अपने शिष्यों के साथ उस सभा में प्रवेश करके स्वस्तिकरूपी शय्या से आच्छादित स्वर्णमयी पीठ पर बैठ गए। आसन ग्रहण करके उन्होंने दूतों को आदेश दिया-॥10-11॥   |   ramayan सर्ग 2.81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  2.81.10-11 
शातकुम्भमयीं रम्यां मणिहेमसमाकुलाम्।
सुधर्मामिव धर्मात्मा सगण: प्रत्यपद्यत॥ १०॥
स काञ्चनमयं पीठं स्वस्त्यास्तरणसंवृतम्।
अध्यास्त सर्ववेदज्ञो दूताननुशशास च॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वह सभाभवन अधिकांशतः सोने का बना हुआ था। उसमें स्वर्ण के स्तंभ थे। वह सुन्दर सभा देवताओं की पुण्यसभा के समान शोभायमान थी। सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता पुण्यात्मा वसिष्ठ अपने शिष्यों के साथ उस सभा में प्रवेश करके स्वस्तिकरूपी शय्या से आच्छादित स्वर्णमयी पीठ पर बैठ गए। आसन ग्रहण करके उन्होंने दूतों को आदेश दिया-॥10-11॥
 
That meeting hall was mostly made of gold. It had golden pillars. That beautiful assembly was as beautiful as the virtuous assembly of the gods. The virtuous Vasistha, the knowledgeable person of the entire Vedas, entered the gathering with his disciples and sat on a golden bench covered with a swastika-shaped bed. After taking the seat, he ordered the messengers -॥ 10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)