श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.81.1 
ततो नान्दीमुखीं रात्रिं भरतं सूतमागधा:।
तुष्टुवु: सविशेषज्ञा: स्तवैर्मङ्गलसंस्तवै:॥ १॥
 
 
अनुवाद
यहाँ अयोध्या में यह देखकर कि उस शुभ रात्रि का केवल थोड़ा सा ही भाग शेष रह गया है, स्तुति-कला में निपुण सूत और मागधगण शुभ स्तुतियों द्वारा भरत की स्तुति करने लगे॥1॥
 
Here in Ayodhya, seeing that only a small portion of that auspicious night was remaining, the Sutas and Magadhas, experts in the art of praise, began to praise Bharata with auspicious praises. ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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