श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 80: अयोध्या से गङ्गा तट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.80.6 
लता वल्लीश्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च।
जनास्ते चक्रिरे मार्गं छिन्दन्तो विविधान् द्रुमान्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वे लताएँ, लताएँ, झाड़ियाँ, वृक्षों के ठूँठ और पत्थर हटाकर तथा नाना प्रकार के वृक्षों को काटकर मार्ग तैयार करने लगे ॥6॥
 
They began to prepare the path by removing creepers, vines, bushes, stumps of trees and stones and by cutting down various kinds of trees. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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